काला धन देश भर में आज चर्चा का विषय है। केंद्र की मोदी सरकार दावे कर रही है कि उन्होंने काले धन पर सबसे बड़ा हमला बोला है। विपक्षी पार्टियां भी खुद को भ्रष्टाचार और काले धन का सबसे बड़ा दुश्मन बताने में लगी है। लेकिन हक़ीक़त इस नूराकुश्ती से कहीं अलग है।
प्रधानमंत्री ने कहा नोटबंदी ज़रूरी है, इससे कालाधन रूकेगा। हमने ख़ुशी ख़ुशी मान लिया। उन्होंने कहा कुछ दिन सबको तकलीफ़ झेलनी पड़ेगी। हमने कहा कोई बात नहीं। हमने हर तरह की परेशानी झेली। विपक्षी पार्टियों ने विरोध किया। हमने कहा भाई विरोध के लिए विरोध नहीं करो। हम सबने देखा कि इतना बड़ा क़दम उठाने के पहले सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की थी। लेकिन हमने सोचा कि किसी भी बड़े काम में कुछ गड़बड़ी तो हो ही जाती है। हमने सब कुछ माना, सब कुछ झेला और विश्वास किया ताकि देश से कालेधन की बिमारी हमेशा के लिए ख़त्म की जा सके।
लेकिन अब मन में कुछ सवाल उठने लगे हैं। क्या नोटबंदी से सचमुच कालेधन पर असर पड़ेगा? क्या कालेधन पर क़ाबू पाने के लिए जो बड़े क़दम उठाने की ज़रूरत है, उसके लिए सरकार तैयार है? कहीं कालेधन के बड़े सवालों से ध्यान बाँटने के लिए तो नोटबंदी की चर्चा नहीं हो रही? प्रधानमंत्री हमारे मन की बात भी सुनते तो हम जाँचते कि क्या वो सचमुच कालेधन को रोकना चाहते हैं? सवाल पूछते कि अगर नोटबंदी हो सकती है तो:
1. पार्टियों से भी उनके हज़ारों करोड़ों के कैश चंदे का हिसाब क्यों नहीं माँगा जा सकता?
2. बीजेपी और काँग्रेस जैसी विदेशी फ़ंड लेने वाली पार्टियों को सज़ा क्यों नहीं हो सकती?
3. विदेशों में बेनामी कंपनी खोलकर ब्लैक को ह्वाइट करने का धंधा बंद क्यों नहीं हो सकता?
4. बैंकों के लाखों करोड़ डुबाने वाले अडानी-अंबानी और माल्या बंद क्यों नहीं हो सकते?
5. भ्रष्टाचार निरोधक कानून (PCA) को ढीला करने की साज़िश क्यों नहीं रूक सकती?
6. पिछले ढाई साल से लोकपाल की नियुक्ति क्यों नहीं हो सकी?
ऐसे कई सवाल लोगों के मन में हैं। ये सवाल पूछने देश भर से लोग रविवार 18 दिसंबर को जंतर-मंतर पर आ रहे हैं। वो सब लोग जिन्होंने आज से पांच साल पहले रामलीला मैदान से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग शुरू की थी। जिन्होंने बड़े-बड़े नेताओं और पार्टियों की हवा निकाल दी थी। वो पब्लिक जो सब जानती है।

Post a Comment